छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पंडित रविशंकर शुक्ल यूनिवर्सिटी के चौकीदार को दी गई अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना विभागीय जांच के किसी भी कर्मचारी पर दंडात्मक कार्रवाई करना पूरी तरह अवैधानिक है।
रायपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के हितों में एक अहम फैसला सुनाते हुए पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय (PRSU) के एक आदेश को अवैधानिक करार दिया है। हाईकोर्ट के जस्टिस एनके व्यास ने स्पष्ट किया है कि किसी भी कर्मचारी के खिलाफ नियमित विभागीय जांच के बिना दंडात्मक कार्रवाई करना कानूनन गलत है। कोर्ट ने यूनिवर्सिटी के उस आदेश को निरस्त कर दिया है जिसके तहत एक चौकीदार को अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी गई थी।
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता रामसिंह यादव की नियुक्ति 6 जुलाई 2002 को यूनिवर्सिटी में चौकीदार के पद पर हुई थी और 8 जुलाई 2004 को उन्हें नियमित किया गया था। रामसिंह पर 7 जून से 4 अगस्त 2011 तक ड्यूटी से अनुपस्थित रहने का आरोप था। नोटिस का जवाब देते हुए चौकीदार ने अपनी बीमारी और हृदय संबंधी परेशानियों का हवाला दिया था। इसके बावजूद, यूनिवर्सिटी ने 10 सितंबर 2012 को एक वेतनवृद्धि रोक दी और बाद में 16 अप्रैल 2013 को उसे अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी।
हाईकोर्ट के निर्देश
यूनिवर्सिटी द्वारा 11 जुलाई 2018 को याचिकाकर्ता का अभ्यावेदन खारिज किए जाने के बाद, चौकीदार ने न्याय के लिए हाईकोर्ट का रुख किया था। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश दंडात्मक प्रकृति का था, जिसे बिना किसी नियमित विभागीय जांच के जारी किया गया था।
हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय को निर्देश दिया है कि कर्मचारी को तुरंत सेवा में वापस लिया जाए और दो महीने के भीतर वेतन का काल्पनिक निर्धारण किया जाए। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सेवा से बाहर रहने की अवधि का पिछला वेतन (बैक सैलरी) कर्मचारी को नहीं मिलेगा।