राजनांदगांव के जैन बगीचा स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय भवन में मुनिश्री समयप्रभ सागर ने चातुर्मासिक प्रवचन दिया। उन्होंने कहा कि अंत समय में जैसी मति होती है, वैसी ही गति मिलती है और बचपन के संस्कार ही जीवन में काम आते हैं।
राजनांदगांव: जैन बगीचा स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय भवन में अपने नियमित चातुर्मासिक प्रवचन के दौरान खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर के शिष्य मुनिश्री समयप्रभ सागर ने सोमवार को धर्मप्रेमियों को जीवन के कई अहम और आध्यात्मिक पाठ पढ़ाए। उन्होंने क्वांटिटी (मात्रा) की बजाय क्वालिटी (गुणवत्ता) पर ध्यान देने की बात कही।
क्वालिटी पर दें ध्यान, क्वांटिटी का नहीं कोई मतलब
मुनिश्री ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि यदि आप क्वांटिटी देखेंगे तो क्वालिटी को भूल जाएंगे, और अगर क्वालिटी चाहिए तो क्वांटिटी को छोड़ना होगा। उन्होंने कहा कि यदि गुणवत्ता ठीक नहीं है, तो मात्रा का कोई औचित्य नहीं रह जाता। जीवन में हमारी मति अच्छी होनी चाहिए, क्योंकि जैसा कि सर्वविदित है— 'अंत समय में हमारी जैसी मति होगी, वैसी ही हमारी गति होगी।'
बचपन के संस्कार ही आते हैं काम
संस्कारों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए मुनिश्री ने कहा कि जब बच्चा नासमझ होता है, तब उसमें संस्कार के बीज बोना सबसे आसान होता है। जैसे-जैसे बच्चा समझदार होता जाता है, उसमें संस्कार डालना उतना ही कठिन हो जाता है, क्योंकि समझदार होने के बाद वह अपनी दुनिया में व्यस्त हो जाता है। इसलिए बचपन में दिए गए संस्कार ही अंततः जीवन में सबसे अधिक काम आते हैं।
कृतज्ञता और संवत्सरी पर्व का महत्व
मुनिश्री ने उपकारी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और बच्चों को अच्छे संस्कार देने की सीख दी। उन्होंने कहा कि इस दुनिया में फूल और कांटे दोनों बिखरे पड़े हैं, हमें कांटे छोड़कर फूल चुनना चाहिए और आराधना के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने बताया कि आगामी कल से संवत्सरी पर्व शुरू हो रहा है, जो कि शुद्ध आराधना का पर्व है और हमें उन्नत मार्ग पर ले जाता है। पुण्य संचय के लिए अधिक से अधिक धर्म आराधना करने का आह्वान किया गया।